1990 का मंडल आयोग विरोधी आंदोलन भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा मोड़ था, जिसने देश की राजनीति, आरक्षण नीतियों और सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया।
1. आंदोलन की पृष्ठभूमि (Background)
द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग): 1979 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने बी.पी. मंडल (बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल) की अध्यक्षता में 'द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग' का गठन किया था। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी लगभग 52% बताते हुए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27% आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी।
10 साल तक ठंडे बस्ते में: 1980 से 1990 तक कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में यह रिपोर्ट लागू नहीं की गई।
घोषणा (7 अगस्त 1990): तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार (जिसे भाजपा और वामदलों का बाहर से समर्थन प्राप्त था) ने 7 अगस्त 1990 को संसद में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
छात्रों का गुस्सा और आंदोलन: इस निर्णय के बाद देश के उच्च जाति के युवाओं और छात्रों में भारी असंतोष फैल गया। उन्हें लगा कि इससे सामान्य वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों के अवसर बेहद सीमित हो जाएंगे। देश भर (विशेषकर उत्तर भारत) के विश्वविद्यालयों में हड़ताल, चक्का जाम और प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसने आगे चलकर राजीव गोस्वामी के आत्मदाह प्रयास के बाद अत्यंत उग्र और हिंसक रूप ले लिया।

आत्मदाह और राजीव गोस्वामी (Mandal Commission Protests)
अक्टूबर 1990 में, दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के छात्र राजीव गोस्वामी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा 'मंडल आयोग' की सिफारिशों को लागू करने (सरकारी नौकरियों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण) के विरोध में आत्मदाह का प्रयास किया था। ऐसा करने वाले वे पहले छात्र थे। उनके इस कदम ने कॉलेज के छात्रों के बीच विरोध प्रदर्शन की एक प्रचंड लहर पैदा कर दी, जिसने आगे चलकर मंडल आयोग की आरक्षण नीतियों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन का रूप ले लिया।
राजीव गोस्वामी बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के अध्यक्ष भी चुने गए। हालांकि, आत्मदाह के दौरान वे 70% तक झुलस गए थे, जिसके कारण लगभग एक दशक तक शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं और पीड़ा से जूझने के बाद उनका निधन हो गया।




आत्महत्या और आत्मदाह के विरोध की लहर
हालांकि राजीव गोस्वामी इस घटना में जीवित बच गए थे, लेकिन वे इस आरक्षण विरोधी आंदोलन का मुख्य चेहरा बन गए। इसके तुरंत बाद छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयासों की एक भयावह लहर शुरू हो गई:
आंकड़े: इतिहासकार रामचंद्र गुहा के अनुसार, लगभग 200 छात्रों ने आत्मदाह के प्रयास किए, जिनमें से 60 से अधिक छात्रों की मौत हो गई। अन्य रिपोर्टों के अनुसार, आत्महत्या के प्रयासों की संख्या 159 थी, जिनमें 63 छात्रों ने अपनी चोटों के कारण दम तोड़ दिया था।
अन्य प्रमुख पीड़ित:
सुरिंदर सिंह चौहान (22 वर्ष, नई दिल्ली) – इस आंदोलन के दौरान आत्मदाह से हुई पहली मौत।
मोनिका चड्ढा (19 वर्ष, नई दिल्ली)
अनिल कुमार (15 वर्ष, टेकरी, हरियाणा)
सौरभ वर्मा (20 वर्ष, इंदौर)
सुसर्ला वामसी मोहन (20 वर्ष, हैदराबाद)
नरिंदर कौर (16 वर्ष, पठानकोट)
सरोज सैनी (15 वर्ष, चंडीगढ़)
शमा गुप्ता (चंडीगढ़)
चेतन गौतम (13 वर्ष)
अपर्णा देशपांडे (जबलपुर)
रवींद्र कुमार (जबलपुर)

2. राजनीतिक प्रभाव (Political Impact)
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से भारतीय राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल गया:
'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति:
मंडल नीति के जवाब में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और एकीकरण के लिए लालकृष्ण आडवाणी की 'राम रथ यात्रा' (अयोध्या राम मंदिर आंदोलन) शुरू की। इसे 'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति कहा गया।

वी.पी. सिंह सरकार का गिरना: रथ यात्रा के दौरान बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे नवंबर 1990 में सरकार गिर गई।
पिछड़े वर्गों का राजनीतिक सशक्तिकरण:
इस आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति में ओबीसी नेताओं का वर्चस्व स्थापित हुआ।
उत्तर भारत में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, और नितीश कुमार जैसे नेताओं का राजनीतिक उभार इसी दौर की देन है।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और क्षेत्रीय दलों की पकड़ मजबूत हुई, जिससे केंद्र में 'गठबंधन राजनीति' (Coalition Era) के युग की शुरुआत हुई।
3. कानूनी बदलाव और ऐतिहासिक न्यायिक फैसले (Legal Changes & Landmark Judgments)
मंडल आयोग के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, जिसके बाद भारतीय आरक्षण व्यवस्था को लेकर कई ऐतिहासिक कानूनी सिद्धांत तय हुए:
इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामला (1992)

यह भारतीय संवैधानिक कानून का सबसे महत्वपूर्ण फैसला (Indra Sawhney Case) माना जाता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश दिए:
27% आरक्षण को हरी झंडी: कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27% आरक्षण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
50% की सीमा (50% Cap): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट नियम तय किया कि कुल आरक्षण (SC, ST और OBC मिलाकर) किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए (सिवाय अत्यंत असाधारण परिस्थितियों के)।
क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत: कोर्ट ने आदेश दिया कि OBC वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों (क्रीमी लेयर) को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाए ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ मिल सके।
पदोन्नति में आरक्षण पर रोक: कोर्ट ने कहा कि आरक्षण केवल शुरुआती नियुक्तियों (Initial Appointments) में लागू होगा, पदोन्नति (Promotions) में नहीं। (हालांकि बाद में संसद ने संवैधानिक संशोधनों के जरिए SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण को पुनः बहाल किया।)
निष्कर्ष
1990 का मंडल आंदोलन केवल आरक्षण का विरोध नहीं था, बल्कि इसने भारत के सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक समीकरणों को पुनर्गठित किया। इसने भारत में 'सकारात्मक कार्रवाई' (Affirmative Action) के कानूनी ढांचे को मजबूत किया और सत्ता में पिछड़े वर्गों की भागीदारी को स्थायी रूप से सुनिश्चित कर दिया।
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