आरक्षण हटाओ आंदोलन” (Reservation Hatao Andolan) एक हालिया अभियान है जो जाति-आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर सहायता की मांग करता है। यह मुख्य रूप से सोशल मीडिया (खासकर इंस्टाग्राम) से शुरू हुआ और अब सड़क पर भी दिखा।

कौन कर रहा है?
कोई एक बड़ा चेहरा या पार्टी प्रमुख नेता नहीं है। यह नागरिक-नेतृत्व वाला अभियान बताता है। इंस्टाग्राम पेज “Reservation Hatao Andolan” के करीब 5.6 मिलियन फॉलोअर्स हैं। कुछ नाम जैसे हर्ष दुबे एवं अजीत भारती चर्चा में आए हैं, लेकिन कोई पारंपरिक राजनीतिक चेहरा या बड़े संगठन का आधिकारिक समर्थन नहीं है। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा जैसे कुछ समूह जुड़े दिखे।

हर्ष दुबे एक युवा छात्र नेता और NEET के छात्र (आकांक्षी) हैं।उन्होंने जाति-आधारित आरक्षण और कट-ऑफ में अंतर का खुलकर विरोध करते हुए इस आंदोलन की अगुवाई की है।वह 'रिजर्वेशन रिफॉर्म आंदोलन' यूजीसी/आरक्षण विरोध से जुड़े रहे हैं।

अजीत भारती एक जाने-माने स्वतंत्र पत्रकार, राजनीतिक टिप्पणीकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर (YouTuber/Vlogger) हैं। अजीत भारती पर यूट्यूब प्रसारण को लेकर एफआईआर दर्ज की गई, उन पर एससी-एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।

Backed by citizens discarded by reservation politics, driven by merit. पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर जाति-जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर.

INSTAGRAM पेज पर के 5.7M followers है RHA Reforms Andolan

जबकि ट्विटर X पेज पर - RHA Reforms

RHA Reforms

कब और कहाँ?

जुलाई 2026 में सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। 21-23 अगस्त 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस पर प्रदर्शन हुए। पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया क्योंकि अनुमति नहीं थी। इससे पहले नागपुर, जयपुर, लखनऊ आदि जगहों पर भी छोटी-मोटी रैलियां हुईं।

मांगें क्या हैं?

  1. जाति की जगह आर्थिक स्थिति को मुख्य आधार बनाना।

  2. गरीब व्यक्ति को जाति चाहे जो हो, शिक्षा-कोचिंग में मदद।

  3. क्रीमी लेयर लागू करना (खासकर SC/ST में भी)।

  4. आरक्षण के 80 साल के प्रभाव पर सरकारी व्हाइट पेपर।

  5. IIT-IIM जैसी जगहों पर न्यूनतम मेरिट बनाए रखना।

RHA Reforms

पहले के बड़े आंदोलन

  • 1990: मंडल कमीशन के खिलाफ बड़े विरोध (वी.पी. सिंह सरकार)।

    • आत्मदाह और राजीव गोस्वामी (Mandal Commission Protests)

      अक्टूबर 1990 में, दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के छात्र राजीव गोस्वामी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा 'मंडल आयोग' की सिफारिशों को लागू करने (सरकारी नौकरियों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण) के विरोध में आत्मदाह का प्रयास किया था। ऐसा करने वाले वे पहले छात्र थे। उनके इस कदम ने कॉलेज के छात्रों के बीच विरोध प्रदर्शन की एक प्रचंड लहर पैदा कर दी, जिसने आगे चलकर मंडल आयोग की आरक्षण नीतियों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन का रूप ले लिया। हालांकि, आत्मदाह के दौरान वे 70% तक झुलस गए थे, जिसके कारण लगभग एक दशक तक शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं और पीड़ा से जूझने के बाद उनका निधन हो गया।

    • आत्महत्या और आत्मदाह के विरोध की लहर

      हालांकि राजीव गोस्वामी इस घटना में जीवित बच गए थे, लेकिन वे इस आरक्षण विरोधी आंदोलन का मुख्य चेहरा बन गए। इसके तुरंत बाद छात्रों द्वारा आत्मदाह के प्रयासों की एक भयावह लहर शुरू हो गई:

      • आंकड़े: इतिहासकार रामचंद्र गुहा के अनुसार, लगभग 200 छात्रों ने आत्मदाह के प्रयास किए, जिनमें से 60 से अधिक छात्रों की मौत हो गई। अन्य रिपोर्टों के अनुसार, आत्महत्या के प्रयासों की संख्या 159 थी, जिनमें 63 छात्रों ने अपनी चोटों के कारण दम तोड़ दिया था।

    • अन्य प्रमुख पीड़ित: सुरिंदर सिंह चौहान (22 वर्ष, नई दिल्ली) – इस आंदोलन के दौरान आत्मदाह से हुई पहली मौत। मोनिका चड्ढा (19 वर्ष, नई दिल्ली) अनिल कुमार (15 वर्ष, टेकरी, हरियाणा) सौरभ वर्मा (20 वर्ष, इंदौर) सुसर्ला वामसी मोहन (20 वर्ष, हैदराबाद) नरिंदर कौर (16 वर्ष, पठानकोट) सरोज सैनी (15 वर्ष, चंडीगढ़) शमा गुप्ता (चंडीगढ़) चेतन गौतम (13 वर्ष) अपर्णा देशपांडे (जबलपुर) रवींद्र कुमार (जबलपुर)

      mandal commission protest
  • 2006: ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के खिलाफ मेडिकल-इंजीनियरिंग छात्रों का आंदोलन।
    ये आंदोलन भी ज्यादातर जनरल कैटेगरी युवाओं से जुड़े थे।

क्यों कोई बड़ी पार्टी समर्थन नहीं करती?
सभी पार्टियां जानती हैं कि आरक्षण बहुत संवेदनशील मुद्दा है। इसमें हाथ डालने से वोट बैंक टूट सकता है।

  • सत्ताधारी दल के लिए: कोई बदलाव सत्ता के लिए खतरा बन सकता है।

  • विपक्ष (कांग्रेस आदि) के लिए: वे अक्सर 50% की सीमा बढ़ाने की बात करते हैं। इसके उलट रुख अपनाने से उनके पारंपरिक वोटर्स नाराज हो सकते हैं।

  • भाजपा के लिए भी 50-50 की स्थिति है। पहले भी उन्हें “आरक्षण विरोधी” बताकर छवि धूमिल करने की कोशिश हुई थी।

दोनों पक्ष
एक तरफ: कई युवा (खासकर जनरल कैटेगरी) कहते हैं कि मेरिट और प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है। आर्थिक रूप से कमजोर किसी भी जाति का व्यक्ति पीछे छूट जाता है।
दूसरी तरफ: आरक्षण समर्थक कहते हैं कि यह ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई है। सामाजिक पिछड़ापन अभी भी मौजूद है। पूरी तरह हटाने से असमानता बढ़ेगी।

Important comments -

  • मायावती (BSP प्रमुख): उन्होंने कहा कि SC, ST और OBC समाज को मिला आरक्षण सदियों से जारी जातिवादी शोषण और सामाजिक भेदभाव की भरपाई के लिए संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई खैरात।

  • अखिलेश यादव (SP अध्यक्ष): "आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा", अखिलेश यादव ने आंदोलन और उस पर सरकार के रुख पर हमला बोलते हुए साफ कहा कि PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समाज का आरक्षण अधिकार है जिसे कोई खत्म नहीं कर सकता।

  • केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान (लोजपा - रामविलास) - "आरक्षण कोई खैरात नहीं है, यह एक संवैधानिक अधिकार है जिसे दुनिया की कोई भी ताकत खत्म नहीं कर सकती।"

  • केंद्रीय राज्य मंत्री रामदास अठावले (आरपीआई - ए)- हमारी स्थिति बहुत स्पष्ट है। जो लोग आरक्षण हटाने की मांग कर रहे हैं, वे पहले देश से जाति प्रथा का अंत करें। जब जाति व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, तो हम खुद आरक्षण पर जोर नहीं देंगे।"

बदलाव मुमकिन है क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने 50% की सीमा तय की है (इंद्रा साहनी फैसला)। इसे तोड़ना बहुत मुश्किल है। EWS आरक्षण आर्थिक आधार पर आया, लेकिन जाति-आधारित आरक्षण पूरी तरह हटाना या बड़ा बदलाव करना फिलहाल दूर की बात लगती है। जो वर्ग लाभ में हैं, वे बदलाव के खिलाफ मजबूत दबाव बनाते हैं।

आंदोलन का भविष्य
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचना आसान नहीं। सरकारें आमतौर पर ऐसे आंदोलनों को नियंत्रित रखती हैं क्योंकि सत्ता का जोखिम रहता है। हिंसा या बड़े दंगे की आशंका भी बनी रहती है। फिर भी, चुपचाप नाराजगी (साइलेंट किलर) चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। खासकर उन पार्टियों पर जिनके वोटर्स में दोनों तरफ के लोग हैं।

सरकार ने बातचीत की संभावना बताई है (आंदोलनकारियों का दावा)। लेकिन बड़े नीतिगत बदलाव की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

- विशेषज्ञ राय आरक्षण व्यवस्था में सुधार की बात समय-समय पर उठती रही है। लेकिन राजनीतिक जोखिम इतना बड़ा है कि कोई पार्टी खुलकर आगे नहीं बढ़ती। आर्थिक आधार पर मदद बढ़ाने और क्रीमी लेयर सख्ती से लागू करने जैसे छोटे कदम संभव हैं। पूरा हटना फिलहाल दूर की बात है। युवाओं की नाराजगी को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है।

इस खबर में लोगAAjeet Bharti
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