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क्सलवाद की मूल पृष्ठभूमि 1967: पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में किसानों का सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। इसे ‘नक्सलवाद’ कहा गया। यह माओवादी विचारधारा पर आधारित था. हिंसक क्रांति के जरिए सत्ता पर कब्जा। दशकों तक यह जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों (छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा आदि) में सक्रिय रहा। सरकार इसे लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म (LWE) कहती है।
‘अर्बन नक्सल’ (Urban Naxal) का उदय
शब्द का स्रोत: फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने 2017 में स्वराज्य मैगजीन में लेख लिखकर और 2018 में अपनी किताब Urban Naxals: The Making of Buddha in a Traffic Jam के जरिए इस शब्द को लोकप्रिय बनाया।
मतलब (उनके अनुसार): शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, प्रोफेसर, पत्रकार या NGO कार्यकर्ता, जो जंगलों में सक्रिय नक्सलियों को वैचारिक, कानूनी, आर्थिक या प्रचार संबंधी समर्थन देते हैं। अग्निहोत्री इन्हें “भारत के अदृश्य दुश्मन” कहते हैं।
माओवादी दस्तावेज का लिंक: CPI (माओवादी) के 2004 के “Urban Perspective” दस्तावेज में शहरों में लीडरशिप, मजदूर संगठन और लॉजिस्टिक सपोर्ट बनाने की रणनीति बताई गई है। सुरक्षा एजेंसियां इसी को आधार बनाती हैं।
राजनीतिक इस्तेमाल:
2018 के भीमा-कोरेगांव/एल्गार परिषद मामले में कई एक्टिविस्टों (सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, गौतम नवलाखा आदि) की गिरफ्तारी के बाद यह शब्द बहुत चर्चा में आया। पुलिस ने उन्हें माओवादी लिंक का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं (अमित शाह, स्मृति ईरानी आदि) ने इसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया। विपक्ष और आलोचक इसे असहमति दबाने का लेबल बताते हैं। सरकार के पास आधिकारिक परिभाषा नहीं है (RTI जवाब में भी पुष्टि हुई)।
आलोचक कहते हैं कि यह शब्द बहुत ढीला है और किसी भी वामपंथी या आलोचक पर चिपका दिया जाता है। समर्थक कहते हैं कि शहरों में वैचारिक समर्थन वास्तविक खतरा है।
‘दिमागी नक्सल’ (Dimagi Naxal)
यह शब्द 15 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से दिए भाषण में पहली बार प्रमुखता से इस्तेमाल किया। मतलब: “दिमागी” यानी बौद्धिक/वैचारिक नक्सल। पीएम ने कहा कि सशस्त्र नक्सल जंगलों से लगभग खत्म हो गए हैं, लेकिन “दिमागी नक्सल” अभी भी संस्थानों और सत्ता के गलियारों में मौजूद हैं। वे हिंसा और अराजकता का रास्ता खोजते हैं। इन्हें पहचानकर अलग-थलग करना जरूरी है। यह ‘अर्बन नक्सल’ का ही विस्तारित रूप है। जहां अर्बन नक्सल शहरों पर फोकस करता था, वहीं दिमागी नक्सल विचारधारा और संस्थानों (सरकारी कमेटियों, विश्वविद्यालयों आदि) पर जोर देता है।दोनों शब्द राजनीतिक रूप से विवादास्पद हैं। एक तरफ इन्हें सुरक्षा चिंता बताया जाता है, दूसरी तरफ असहमति को दबाने का हथियार। असल नक्सल हिंसा पिछले दशक में काफी कम हुई है, लेकिन वैचारिक बहस जारी है।
भारत में लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म की वर्तमान स्थिति
भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों और गृह मंत्रालय के बयानों के अनुसार, नक्सलवाद अब ऐतिहासिक रूप से सबसे कमजोर चरण में है। सरकार ने मार्च/अप्रैल 2026 में देश को प्रभावी रूप से नक्सल-मुक्त घोषित कर दिया है।
2025: 234 घटनाएं, लगभग 100 मौतें।
2026 (जुलाई तक): केवल 33 घटनाएं और 11 मौतें।
आत्मसमर्पण: 2024 से मार्च 2026 तक लगभग 3,927 कैडरों ने हथियार डाले। अकेले 2025 में 2,337 आत्मसमर्पण।
वर्तमान वर्गीकरण (गृह मंत्रालय)
LWE प्रभावित जिले: शून्य।
Legacy & Thrust Districts: 37 जिले (जहां सुरक्षा और विकास सहायता जारी है)।
District of Concern: पहले 1 (झारखंड का वेस्ट सिंहभूम), अब लगभग समाप्त।
क्षेत्रीय स्थिति
छत्तीसगढ़ (पहले सबसे बड़ा हॉटस्पॉट): बस्तर क्षेत्र में भी हिंसा बहुत कम।
झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, बिहार: लगभग पूरी तरह मुक्त।
टॉप लीडरशिप (पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी) लगभग नष्ट हो चुकी है।
सफलता के कारण (सरकार के अनुसार)
सुरक्षा अभियान: तीव्र अभियान, इंटेलिजेंस, ड्रोन और कोऑर्डिनेशन।
विकास: 15,000+ किमी सड़कें, 9,000+ मोबाइल टावर, बैंक शाखाएं, स्कूल और स्किल सेंटर।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास: कैडरों को मुख्यधारा में लाने की नीति।
कई टॉप कमांडर मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके। कुछ छोटे-मोटे अवशेष और आईईडी हमले अभी भी हो सकते हैं।
वैचारिक चुनौती: पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2026 के भाषण में कहा कि सशस्त्र नक्सल खत्म हो गए हैं, लेकिन “दिमागी नक्सल” (वैचारिक समर्थक) अभी मौजूद हैं।
यह एक बड़ी सुरक्षा सफलता है, इसमें शक नहीं। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब ये इलाके सिर्फ “शांत” नहीं, बल्कि समृद्ध, न्यायपूर्ण और मुख्यधारा से जुड़े हुए दिखें। सुरक्षा अभियान ने समस्या का एक बड़ा हिस्सा हल किया है। अब बाकी हिस्सा विकास, स्थानीय शासन और सामाजिक न्याय से जुड़ेगा।
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